पन्द्रह शाबान की रात और ख़ास इबादतें

तहरीर: मुहद्दिसुल अस्र हाफ़िज़ ज़ुबैर अली ज़ई रहमतुल्लाह अलैह


निस्फ़ शाबान की रात की फज़ीलत में कई हदीसें ज़िक्र की जाती हैं जिनका मफ़हूम यह है कि शाबान की पंद्रहवी रात को अल्लाह तआला आसमाने दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाता है और कल्ब क़बीले की बकरियों के बालों से ज़्यादा लोगो (के गुनाहों) को बख़्श देता है”, आदि”।

इन हदीसों की वजह से बहुत से लोग इस रात को ख़ास तौर पर बहुत ज़्यादा इबादत करते हैं”। इस मज़मून में उन रिवायतों का जायज़ा आपके लिए पेश किया जा रहा है:

मुहद्दिस कबीर मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

’’یطلع اللہ تبارک وتعالٰی إلی خلقہ لیلۃ النصف من شعبان، فیغفر لجمیع خلقہ، إلا لمشرک أو مشاحن، حدیث صحیح، روي عن جماعۃ من الصحابۃ من طرق مختلفۃ یشد بعضھا بعضًا وھم معاذ ابن جبل وأبو ثعلبۃ الخشني وعبد اللہ بن عمرو وأبي موسی الأشعري وأبي ھریرۃ وأبي بکر الصدیق وعوف بن مالک وعائشۃ‘‘

शाबान की पंद्रहवी रात को अल्लाह तआला अपनी मख़लूक़ की तरफ़ (ख़ास तौर पर) मुतावज्जो होता है फिर मुशरिक और (मुसलमान भाई से) दुशमनी, बुग़्ज़ रखने वाले के सिवा अपनी सारी (मुसलमान) मख़लूक़ को बख़्श देता है। (अस-सिलसिलातुस सहीहा 3/135 हदीस 1144)

शेख़ रहमतुल्लाह ने जो रिवायत ज़िक्र की है उनकी तख़रीज और उन पर तबसिरह निम्नलिखित है:

1. हदीस मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे (इमाम) मकहूल ने “अन मालिक बिन युख़ामिर अन मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: यह हदीस निम्नलिखित किताबों में इसी सनद के साथ मौजूद है:

किताबुस-सुन्नाह लिब्ने अबी आसिम (ह:512,दूसरा नुसख़ा:524), सहीह इब्ने हिब्बान (मवारिदुज़-ज़मान:1980, अलइहसान:5636), अमाली लिअबुल हसन अल-क़ज़विनी (2/4), अल-मजलिसुस साबिअ लिअबी मुहम्मद अल-जौहरी (2/3), जुज़ मिन हदीस मुहम्मद बिन सुलैमान अर-रबअई (1/712,1/218), अल-अमाली लिअबिल क़ासिम अल-हुसैनी (क़1/12), शोअबुल ईमान लिलबैहक़ी (3/382ह3833,6628), तारीख़ ए दमिश्क लिब्ने असाकिर (40/172,57/75), अस-सालिस वत-तिसईन लिलहाफ़िज़ अब्दुल ग़नी अल-मक़दसी (क़44/2) सिफ़ात रब्बिल आलमीन लिब्ने आजब (7/2,2/129), अल-मोजमुल कबीर लिततबरानी (20/108,109ह215) वल औसत लिततबरानी (7/397ह6772) हुलियतुल औलिया लिअबी नुऐम अल-असबहानी (5/191) ।

हाफ़िज़ ज़हबी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

’’مکحول لم یلق مالک بن یخامر‘‘

मकहूल ने मालिक बिन युख़ामिर से मुलाक़ात नहीं की। (अस-सहीहा 3/135)

यानी यह रिवायत मुनक़ता है।

नतीजा: यह सनद ज़ईफ़ है, उसूल ए हदीस की किताब “तैसीर मुसतलअहुल हदीस” में लिखा हुआ है:

’’المنقطع ضعیف بالاتفاق بین العلماء، وذلک للجھل بحال الراوي المحذوف‘‘

उलमा (मुहद्दीसीन) का इस पर इत्तिफ़ाक़ है कि मुनक़ता (रिवायत) ज़ईफ़ होती है। यह इसलिए कि इसका महज़ूफ़ रावी (हमारे लिए) मजहूल (अपरिचित) होता है। (तैसीर मुसतलअहुल हदीस पेज संख्या 78)

2. हदीस अबू सअलबा रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे अहवस बिन हकीम ने “अन मुहासिर बिन हबीब अन अबू सअलबा रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: किताबुस-सुन्नाह लिब्ने अबी आसिम (ह511,दूसरा नुसख़ा ह523), किताबुल अर्श लिमुहम्मद बिन उस्मान अबी शैबा (ह87, इसमें: बिश्र बिन उमारा अन अहवस बिन हकीम अन मुहासिर बिन हबीब अन मकहूल अन अबी सअलबा), हदीस अबुल क़ासिम अल-अज़अजी (1/67), शरह उसूल ऐतिक़ाद अहलुस-सुन्नाह वल जमाअ तसनीफ़ अल-अलकाई (3/445ह760), मुअजमुल कबीर लिततबरानी (22/224ह593)।

इसका बुनयादी रावी अहवस बिन हकीम: जमहूर मुहद्दिसीन के नज़दीक ज़ईफ़ है। हाफ़िज़ इब्ने हजर ने कहा: “ضعیف الحفظ” (तक़रीब:290)

मुहासिर (मुहाजिर) बिन हबीब की अबू सअलबा रज़ियल्लाहू अन्हु से मुलाक़ात साबित नहीं है।

तंबीह: किताबुल अर्श में मुहासिर और अबू सअलबा रज़ियल्लाहू अन्हु के बीच मकहूल का वास्ता आया है, इसकी सनद में बिश्र बिन उमारा ज़ईफ़ है। (तक़रीब:897)

अल-मुअजमुल कबीर लिततबरानी (22/223ह590) में अल-मुहारबी, इसका मुताबिअ है लेकिन इस सनद के दो रावी अहमद बिन अन-नज़्र अल-असकरी और मुहम्मद बिन आदम अल-मसीसी नामालूम हैं।

अब्दुर्रहमान बिन मुहम्मद अल-मुहारबी मुदल्लिस हैं। (तबक़ातुल मुदल्लिसीन:3/80)

इसे बैहक़ी ने दूसरी सनद के साथ “अल-मुहारबी अन अहवस बिन हकीम अन मुहाजिर बिन हबीब अन मकहूल अन अबी सअलबा अल-ख़ुशनी” की सनद से रिवायत किया है। (शोअबुल ईमान:3832)

3. हदीस अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे हसन (बिन मूसा) ने “हद्दसना इब्ने लहीअह हद्दसना हय्य बिन अब्दुल्लाह अन अबी अब्दुर्रहमान अल-हबली अन अब्दुल्लाह बिन अम्र” की सनद से रिवायत किया है। (मुसनद अहमद2/176ह6642)

यह रिवायत अब्दुल्लाह बिन लहीअह के इख़्तिलात की वजह से ज़ईफ़ है, इब्ने लहीअह के इख़्तिलात के लिए देखिये तक़रीबुत thतहज़ीब (3563), इस बात का कोई सबूत नहीं है कि हसन बिन मूसा ने इब्ने लहीअह के इख़्तिलात से पहले इससे हदीस सुनी है।

हाफ़िज़ मुनज़िरी फ़रमाते हैं:

’’رواہ أحمد بإسناد لین‘‘

इसे अहमद ने ज़ईफ़ सनद के साथ रिवायत किया है। (अत-तरग़ीब वततरहीब 3/460ह4080, और देखिये 2/119ह1519)

मुहद्दिस अलबानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

रिशदीन बिन सअद ने इब्ने लहीअह की मुताबिअत की है। (हदीस इब्ने हयवियह1/10/3 और सिलसिलतुस-सहीहा 3/136)

अर्ज़ है कि रिशदीन सअद बिन मिफ़लह अल-मिहरी बज़ाते ख़ुद ज़ईफ़ है। (देखिये तक़रीबुत तहज़ीब 1942)

लिहाज़ा यह रिवायत अपनी दोनों सनदों के साथ ज़ईफ़ ही है, हसन नहीं है।

4. हदीस अबू मूसा रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे इब्ने लहीअह ने “अन ज़ुबैर बिन सुलैम अन ज़हाक बिन अब्दुर्रहमान अन अबीह क़ाल समिअतु अबू मूसा ......” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज : इब्ने माजा (2/1390), अस-सुन्नाह लिब्ने अबी आसिम (510,दूसरा नुसख़ा:522), अस-सुन्नाह लिलअलकाई (3/447ह763)।

इस सनद में अब्दुर्रहमान बिन अरज़ब मजहूल है। (तक़रीबुत तहज़ीब:3950)

इसी तरह ज़ुबैर बिन सुलैम भी मजहूल है। (तक़रीबुत तहज़ीब:1996)

कुछ किताबों में ग़लती से रबीअ बिन सुलैमान और कुछ में ज़ुबैर बिन सुलैमान छप गया है।

नतीजा: यह सनद ज़ईफ़ है।

तंबीह: इब्ने माजा की दूसरी सनद (1/1390) में इब्ने लहीअह के अलावा वलीद बिन मुस्लिम: मुदल्लिस और ज़हाक बिन ऐमन मजहूल है। (तक़रीब:2965)

यह सनद मुनक़तअ भी है लिहाज़ा यह सनद भी ज़ईफ़ है।

5. हदीस अबू हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे हिशाम बिन अब्दुर्रहमान ने “आमश अन अबी सालेह अन अबी हुरैरा रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: कश्फ़ुल अस्तार अन ज़वाइदिल बज्ज़ार (2/436ह2046), अल-इलअलुल मुतअनाहिया लिब्ने जौज़ी (2/70ह921)

इसका रावी हिशाम बिन अब्दुर्रहमान नामालूमुल अदालत यानी मजहूल है।

हाफ़िज़ हेसमी लिखते हैं कि:

’’ولم أعرفہ‘‘

और मैंने उसे नहीं पहचाना। (मजमुअल ज़वाइद8/65)

नतीजा: यह सनद ज़ईफ़ है।

6. हदीस अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे अब्दुल मलिक बिन अब्दुल मलिक ने “अन मुसअब बिन अबी ज़िअब अन क़ासिम बिन मुहम्मद अन अबीह औ अम्मिही अन अबी बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: कश्फ़ुल अस्तार (2/435ह2045) किताबुल तौहीद लिब्ने ख़ुज़ैमा (पेज नंबर136ह200) अस-सुन्नाह लिब्ने अबी आसिम (509,दूसरा नुसख़ा:521) अस-सुन्नाह लिलअलकाई (3/438,439ह750) अख़बार असबहान लिअबी नुऐम (2/2) अल-बैहक़ी (फ़ी शोअबुल ईमान:3827) इस सनद में अब्दुल मलिक बिन अब्दुल मलिक पर जमहूर मुहद्दिसीन ने जरह की है।

हाफ़िज़ इब्ने हिब्बान ने कहा:

’’منکر الحدیث جدًا‘‘

यह सख़्त मुनकर हदीसें बयान करने वाला है। (किताबुल मजरूहीन2/136)

इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह ने कहा:

’’فیہ نظر‘‘

यह मतरूक व मुतहम है। (अत-तारीख़ुल कबीर5/424)

इमाम दारे क़ुतनी ने कहा: متروک (सवालात अल-बरक़ानी:304)

मुसअब बिन अबी ज़िअब भी ग़ैर मौसूक़ व ग़ैर मारूफ़ है।

देखिये किताबुल जरह व तादील (8/307त1418)

नतीजा: यह सनद ज़ईफ़ है।

7. हदीस औफ़ बिन मालिक रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे इब्ने लहीअह ने “अन अब्दुर्रहमान बिन अनअम अन उबादा बिन नसी अन कसीर बिन मुर्रा बिन औफ़ बिन मालिक रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: कश्फ़ुल अस्तार (2/436ह2048) अल-मजलिसुस साबिअ लिअबी मुहम्मद अल-जौहरी (अस-सहीहा:3/137)

इस रिवायत में अब्दुर्रहमान बिन ज़ियाद बिन अनअम जमहूर मुहद्दिसीन के नज़दीक ज़ईफ़ है।

हाफ़िज़ इब्ने हजर ने कहा: ’’ضعیف في حفظہ …… وکان رجلاً صالحًا‘‘ (तक़रीब:3862)

8. हदीस आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा

इसे हज्जाज बिन अरताह ने “अन यहया बिन अबी कसीर अन उरवा अन आयशा रज़ियल्लाहू अन्हा” की सनद से रिवायत किया है।

तख़रीज: सुनन तिरमिज़ी (1/106ह739), इब्ने माजा (1389), अहमद (6/238ह26546), इब्ने अबी शैबा (अल-मुस्सन्निफ़:10/438ह29849) अब्द बिन हुमैद (1507) अल-बैहक़ी फ़ी शोअबुल ईमान (3824), इलअलुल मुतअनाहिया (2/66ह915)

इमाम तिरमिज़ी फ़रमाते हैं: “मैंने बुख़ारी को यह फ़रमाते हुए सुना कि यह हदीस ज़ईफ़ है। इसे यहया (बिन अबी कसीर) ने उरवा से नहीं सुना और हज्जाज बिन अरताह ने इसे यहया (बिन अबी कसीर) से सुना है।”

हज्जाज बिन अरताह जमहूर के नज़दीक ज़ईफ़ और मुदल्लिस है, यहया बिन अबी कसीर मुदल्लिस हैं।

नतीजा: यह सनद ज़ईफ़ है, इस रिवायत के तीन ज़ईफ़ शवाहिद हैं:

पहला: अल-इलअलुल मुतअनाहिया (2/67,68ह917)।

इसमें सुलैमान बिन अबी करीमा ज़ईफ़ है, वो मुनकर रिवायत बयान करता था, देखिये लिसानुल मीज़ान (3/102)।

दूसरा: अल-इलअलुल मुतअनाहिया (2/68,69ह918)

इसमें सईद इब्न अब्दुल करीम अल-वास्ती का सिक़ा होना नामालूम है, देखिये लिसानुल मीज़ान (3/36)।

तीसरा: अल-इलअलुल मुतअनाहीय (2/69ह919)।

इसमें अता बिन अजलान कज्ज़ाब व मतरूक है, देखिये अल-कश्फ़ुल अममन रुमिया बिवज़इल हदीस (पेज नंबर 289), तक़रीबुत तहज़ीब (4594) ख़ुलासा यह कि यह तीनो शवाहिद मरदूद हैं।

9. हदीस अली रज़ियाल्लाहू अन्हु

इसे इब्ने अबी सबज़ह ने “अन इब्राहीम बिन मुहम्मद अन मुआविया बिन अब्दुल्लाह बिन जाफ़र अन अबीह अन अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहू अन्हु” की सनद से बयान किया है।

तख़रीज: इब्ने माजा (1388), अल-इलअलुल मुतअनाहिया (2/71ह923)।

इसमें अबू बक्र बिन अबी सबज़ह कज्ज़ाब है, देखिये तक़रीबुत तहज़ीब (7973)।

नतीजा: यह रिवायत मौज़ूअ है।

तंबीह: सय्यदना अली रज़ियल्लाहू अन्हु से इस मफ़हूम की और मौज़ूअ व मरदूद रिवायतें भी मरवी हैं, देखिये अल-मौज़ूआत लिब्ने अल-जौज़ी (2/127), मीज़ानुल एतिदाल (3/120), अल-अलाई अल-मसनूअ (2/60)।

10. हदीस कुरदूस रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे ईसा बिन इब्राहीम अल-क़ुरशी ने “अन सलमा बिन सुलैमान अल-जज़री अन मरवान बिन सालिम अन इब्ने कुरदूस अन अबीह” की सनद से बयान किया है। (किताबुल इलअलुल मुतअनाहिया:2/71,72ह924)

इसमें ईसा बिन इब्राहीम मुनकरुल हदीस मतरूक है, मरवान बिन सालिम मतरूक मुतहम है और सलमा का सिक़ा होना नामालूम है।

नतीजा: यह सनद मौज़ूअ है।

11. हदीस इब्ने उमर रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे सालेह अस-समूमी ने “अन अब्दुल्लाह बिन ज़िरार अन यज़ीद बिन मुहम्मद अन अबीह मुहम्मद बिन मरवान अन इब्ने उमर राज़ियल्लाहु अन्हु” की सनद से रिवायत किया है। (अल-मौज़ूआत लिब्ने अल-जौज़ी2/128)

इस सनद में सालेह, अब्दुल्लाह बिन ज़िरार, यज़ीद और मुहम्मद बिन मरवान सब नामालूमुल अदालत यानी मजहूल हैं। हाफ़िज़ इब्ने जौज़ी फ़रमाते हैं कि हमें इसमें कोई शक नहीं कि हदीस मौज़ूअ है। (अल-मौज़ूआत2/129)

12. हदीस मुहम्मद बिन अली अल-बाक़िर रहमतुल्लाह अलैह

इसे अली बिन आसिम (ज़ईफ़) ने “अम्र बिन मिक़दाम अन जाफ़र बिन मुहम्मद अन अबीह” की सनद से रिवायत किया है (अल-मौज़ूआत:2/128,129), अम्र बिन अबुल मिक़दाम राफ़ज़ीमतरूक रावी है। स्यूती ने कहा; यह सनद मौज़ूअ है। (अल-अलाइ अल-मसनूअह:2/59)

अली बिन आसिम से नीचे वाली सनद में भी नज़र है।

13. हदीस उबइ बिन कअब रज़ियल्लाहू अन्हु

इसे इब्ने असाकिर ने नामालूम रावियों के साथ “मुहम्मद बिन हाज़िम अज़-ज़हाक बिन मज़ाहिम अन उबइ इब्न कअब” की सनद से बयान किया है। (देखिये अल-अलाई अल-मसनूअह, पेज नंबर 112,113)

यह रिवायत मुनक़तअ होने के साथ मौज़ूअ भी है।

14. मकहूल ताबइ रहमतुल्लाह अलैह का क़ौल

इमाम मकहूल रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

पन्द्रह शाबान को अल्लाह तआला ज़मीन वालों की तरफ़ (ख़ास तौर पर) मुतावज्जो होता है फिर वो काफ़िर और एक दुसरे से दुशमनी रखने वाले के सिवा सब लोगों को बख़्श देता है। (शोअबुल ईमान लिलबैहक़ी3/381ह3830)

यह सनद हसन है लेकिन यह हदीस नहीं बल्कि ईमाम मकहूल का क़ौल है, मालूम हुआ कि मकहूल के क़ौल को ज़ईफ़ व मजहूल रावियों ने मरफ़ूअ के तौर पर बयान कर रखा है। मकहूल के क़ौल को मरफ़ूअ हदीस बना देना सहीह नहीं है और अगर बना दिया जाये तो मुरसल होने की वजह से ज़ईफ़ है।

तहक़ीक़ का ख़ुलासा:

पन्द्रह शाबान वाली कोई रिवायत भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हुम अजमईन से साबित नहीं है।

मुहक्क़िक़ो का फ़ैसला:

अबू बक्र बिन अरबी लिखते हैं:

’’ولیس في لیلۃ النصف من شعبان حدیث یعول علیہ لافی فضلھا و لا في نسخ الآجال فیھا، فلا تلتفتوا إلیھا‘‘

यानी निस्फ़ शाबान की रात और फ़ज़ीलत के बारे में कोई हदीस क़ाबिल ए एतिमाद नहीं है और इस रात को मौत के फ़ैसले की मनसूख़ी के बारे में भी कोई हदीस क़ाबिल ए एतिमाद नहीं है, तो आप इन (नाक़ाबिल ए एतिमाद) हदीसों की तरफ़ (ज़र्रा भी) इलतिफ़ात न करें। (अहकामुल क़ुरआन4/1690)

हाफ़िज़ इब्ने क़य्यिम लिखते हैं:

’’لا یصح منھا شئ‘‘

यानी पन्द्रह शाबान की रात को ख़ास नमाज़ वाली रिवायतों में से कोई चीज़ भी साबित नहीं है। (अल-मनारुल मुनीर पेज नंबर 98,99)

हाफ़िज़ इब्ने क़य्यिम मज़ीद फ़रमाते हैं:

“ताज्जुब है उस शख़्स पर, जिसको सुन्नत की सूझ बूझ है, वो भी यह मौज़ूअ रिवायतें सुनकर ऐसी (अजीब व ग़रीब) नमाज़ पढ़ता है। (एक सौ रकात एक हज़ार सुरह इख़लास के साथ)” (अल-मनारुल मुनीफ़ पेज नंबर 99 मफ़हूम)

हसन लिग़ैरिह!?

मुहद्दिस कबीर शेख़ अलबानी रहमतुल्लाह अलैह ने पन्द्रह शाबान वाली रिवायत को तअदाते तुर्क़ की वजह से “सहीह” क़रार दिया है। हालांकि यह रिवायत “सहीह लिग़ैरिह” के दर्जे तक भी नहीं पहुँचती, इसकी एक सनद भी सहीह या हसन लिज़ातिही नहीं है तो यह किस तरह सहीह बन गई?

कुछ कहते हैं कि यह रिवायत हसन लिग़ैरिह है, अर्ज़ है कि हसन लिग़ैरिह की दो क़िस्में हैं:

(1) एक ज़ईफ़ सनद वाली रिवायत जो बज़ाते ख़ुद ज़ईफ़ है, जबकि दूसरी रिवायत हसन लिज़ातिही है। यह सनद इस हसन लिज़ातिही के साथ मिल कर हसन हो गई।

(2) एक ज़ईफ़ सनद वाली रिवायत जो बज़ाते ख़ुद ज़ईफ़ है और इस मफ़हूम की दूसरी ज़ईफ़ व मरदूद रिवायतें भी मौजूद हैं तो कुछ उलमा इसे हसन लिग़ैरिह समझते हैं हालांकि यह भी ज़ईफ़ हदीस की एक क़िस्म है।

दलील नंबर 1: क़ुरआन व हदीस व इजमाअ से यह बिल्कुल साबित नहीं है कि

ज़ईफ़+ज़ईफ़+ज़ईफ़=हसन लिग़ैरिह वाली रिवायत हुज्जत है।

दलील नंबर 2: सहाबा किराम रज़ियाल्लाहू अन्हुम से ऐसी रिवायत का हुज्जत होना साबित नहीं है।

दलील नंबर 3: ताबईन किराम रहमतुल्लाह से ऐसी रिवायत का हुज्जत होना साबित नहीं है।

दलील नंबर 4: इमाम बुख़ारी व इमाम मुस्लिम आदि से ऐसी रिवायत का हुज्जत होना साबित नहीं है।

दलील नंबर 5: इमाम तिरमिज़ी रहमतुल्लाह अलैह के अलावा आम मुहद्दिसीन से ऐसी “हसन लिग़ैरिह”रिवायत का हुज्जत होना साबित नहीं है। जैसे मुहम्मद बिन अबी लैला (ज़ईफ़) ने “अन अख़ीह ईसा अन हकम अन अब्दुर्रहमान बिन अबी लैला अन बराअ बिन आज़िब” तरके रफ़ाअ यदैन की एक हदीस बयान की है (सुनन अबू दावूद:752) इसकी सनद ज़ईफ़ है।

और इसके कई ज़ईफ़ शवाहिद हैं, जैसे देखिये सुनन अबू दावूद (749,748) इन तमाम शवाहिद के बावजूद इमाम अबू दावूद फ़रमाते हैं:

’’ھٰذا الحدیث لیس بصحیح‘‘

यह हदीस सहीह नहीं है। (अबू दावूद:752) आम नमाज़ में एक तरफ़ सलाम फेरने की कई रिवायतें भी सहीह या हसन लिज़ातिही नहीं है। इन रिवायतों के बारे में हाफ़िज़ इब्ने अब्दुल बर्र कहते हैं:

’’إلا أنھا معلولۃ ولایصححھا أھل العلم بالحدیث‘‘

मगर यह सब रिवायतें मालूल (ज़ईफ़) हैं, उलमा हदीस इन्हें सहीह क़रार नहीं देते। (ज़ादुल मआद ज1पेज नंबर259)

हाफ़िज़ इब्ने क़य्यिम रहमतुल्लाह अलैह भी फ़रमाते हैं:

’’ولکن لم یثبت عنہ ذلک من وجہ صحیح‘‘

लेकिन आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से सहीह सनद के साथ यह साबित नहीं है। (ज़ादुल मआद पेज नंबर 259)

दलील नंबर 6: हाफ़िज़ इब्ने कसीर रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं:

’’یکفی فی المناظرۃ تضعیف الطریق التي أبداھا المناظر وینقطع، إذالأصل عدم ماسواھا، حتی یثبت بطریق أخری، واللہ أعلم‘‘

मुनाज़रे में यह काफ़ी है कि मुख़ालिफ़ की बयान की हुई सनद का ज़ईफ़ होना साबित कर दिया जाए, वो लाजवाब हो जायेगा क्यूंकि असल यह है कि दूसरी तमाम रिवायत मादूम (व बातिल)हैं, मगर यह कि दूसरी सनद से साबित हो जायें। वल्लाहु आलम (इख़्तिसार उलूमुल हदीस पेज नंबर 85नूअ:22, दूसरा नुसख़ा1/274,275 और इनसे सख़ावी ने फ़तहुल मुग़ीस1/287 फ़ी मअरिफ़तु मन तुक़बलु रिवायातन व मन तुरद्दु में नक़ल किया है)

दलील नंबर 7: इब्ने क़त्तान अल-फ़ासी ने हसन लिग़ैरिह के बारे में सराहत की है:

’’لایحتج بہ کلہ بل یعمل بہ فی فضائل الأعمال ……‘‘ إلخ

इस सारी के साथ हुज्जत नहीं पकड़ी जाती बल्कि फ़ज़ाइले आमाल में इस पर अमल किया जाता है। (अन-नुकत अला किताब इब्ने सलाह:1/402)

दलील नंबर 8: हाफ़िज़ इब्ने हजर ने इब्ने क़त्तान के क़ौल को “हसन क़वी” कहा है। (अन-नुकत1/402)

दलील नंबर 9: हनफ़ी व शाफ़ई आदि उलमा जब एक दुसरे का रद्द करते हैं तो ऐसी हसन लिग़ैरिह रिवायत को हुज्जत तसलीम नहीं करते जैसे कई ज़ईफ़ सनदों वाली एक रिवायत “” के मफ़हूम वाली रिवायत को अल्लामा नव्वी ने ज़ईफ़ क़रार दिया है। (ख़ुलासतुल अहकाम जिल्द1पेज नंबर377ह1173,फ़ज़्ल फ़ी ज़ईफ़ा)

कई सनदों वाली फ़ातिहा ख़लफ़ुल इमाम की रिवायत को नैमूनी हनफ़ी ने मालूल आदि क़रार दे कर रद्द कर दिया है। देखिये आसारुस-सुनन (ह353,354,355,356)

दलील नंबर 10: आजके दौर में बहुत से उलमा कई सनदों वाली रिवायतों जिनका ज़ोफ़ शदीद नहीं होता पर जरह करके ज़ईफ़ व मरदूद क़रार देते हैं, जैसे फ़ातिहा ख़लफ़ुल इमाम के सबूत में “”वाली रिवायत के बारे में मुहद्दिस अलबानी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं: “ज़ईफ़”“” (देखिये तहक़ीक़ सुनन अबू दावूद:823)

हालांकि इस रिवायत के बहुत से शवाहिद हैं देखिये किताबुल क़िरआत लिलबैहक़ी वल कवाकिबुद दरया फ़ी वुजूबुल फ़ातिहा ख़लफ़ुल इमाम फ़िल जहर लिराक़िमुल हुरूफ़, इन कई सनदों और शवाहिद के बावजूद शेख़ अलबानी रहमतुल्लाह अलैह इसे हसन लिग़ैरिह (!) तक तसलीम नहीं करते। (जबकि फ़ातिहा ख़लफ़ुल इमाम वाली रिवायत हसन लिज़ातिही और सहीह लिग़ैरिह है, वलहम्दुल्लिल्लाह)

ख़ुलासा यह कि निस्फ़ शाबान वाली रिवायत ज़ईफ़ ही है।

ज़ईफ़ हदीस पर फ़ज़ाइल में अमल

कुछ लोग फ़ज़ाइल में (जब मर्ज़ी के मुताबिक़ हो तो) ज़ईफ़ रिवायतों को हुज्जत तसलीम करते हैं और उन पर अमल के क़ाइल व फ़ाइल हैं लेकिन मुहक़्क़िक़ीन का एक ग्रोह ज़ईफ़ हदीस पर मुतलक़न अमल न करने का क़ाइल वफ़ाइल है, यानी अहकाम व फ़ज़ाइल में उनके नज़दीकज़ईफ़ हदीस नाक़ाबिल ए अमल है। जमालुद्दीन क़ासमी (शामी) ने ज़ईफ़ हदीस के बारे में पहला मसलक यह नक़ल किया है:

“अहकाम हों या फ़ज़ाइल, इस पर अमल नहीं किया जाएगा, इसे इब्ने सय्य्दुन नास ने उयूनुल असर में इब्ने मईन ने नक़ल किया है और (सख़ावी ने) फ़तहुल मुग़स में अबू बक्र अरबी से मंसूब किया है और ज़ाहिर है कि इमाम बुख़ारी व इमाम मुस्लिम का यही मसलक है सही बुख़ारी की शर्त इस पर दलालत करती है। इमाम मुस्लिम ने ज़ईफ़ हदीस के रावियों पर सख़त तनक़ीद की है जैसा कि हमने पहले लिख दिया है। दोनों इमामों ने अपनी किताबों में ज़ईफ़ रिवायतों में से एक रिवायत भी फ़ज़ाइल व मनाक़िब में नक़ल नहीं की।” (क़वाइदुत तहदीस पेज नंबर 113, अलहदीस हज़रो:4 पेज नंबर 7)

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु मुरसल रिवायतों को सुनने के क़ाइल ही न थे। (देखिये मुक़दमा सहीह मुस्लिम:21, अन-नुकत अला किताब इब्ने सलाह ह2/553)

मालूम हुआ कि इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु ज़ईफ़ हदीस को फ़ज़ाइल में भी हुज्जत तसलीम नहीं करते थे। हाफ़िज़ इब्ने हिब्बान फ़रमाते हैं:

’’کأن ماروی الضعیف ومالم یرو فی الحکم سیان‘‘

जैसे कि ज़ईफ़ जो रिवायत बयान करे और जिस रिवायत का वजूद ही न हो, वो दोनों हुक्म में एक बराबर हैं। (किताबुल मजहूरीन:1/328 तर्जुमा सईद बिन ज़ियाद बिन क़ाइद)

मरवान (बिन मुहम्मद अत-तातरी) कहते हैं कि मैंने (इमाम) लैस बिन सअद (अल-मिसरी) से कहा: “आप अस्र के बाद क्यूँ सो जाते हैं जबकि इब्ने लहीअह ने हमें अन उक़ैल अन मकहूल अन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वासल्लम की सनद से हदीस बयान की है कि: जो शख़स अस्र के बाद सो जाए फिर उसकी अक़ल चली जाये तो वो सिर्फ़ अपने आपको ही मलामत करे। लैस बिन सअद ने जवाब दिया:

’’لا أدع ماینفعني بحدیث ابن لھیعۃ عن عقیل‘‘

मुझे जिस चीज़ से फ़ायदा पहुँचता है, मैं उसे इब्ने लहीअह की उक़ैल से हदीस की वजह से नहीं छोड़ सकता”। (अल-कामिल लिब्ने अदी:4/1463, इसकी सनद सहीह है)

मालूम हुआ कि इमाम लैस बिन सअद भी ज़ईफ़ हदीस पर फ़ज़ाइल में अमल नहीं करते थे।

तंबीह: इब्ने लहीअह इख़्तिलात के बाद ज़ईफ़ हैं और मुदल्लिस भी हैं और यह सनद मुरसल है लिहाज़ा ज़ईफ़ है।

हाफ़िज़ इब्ने हजर असक़लानी फ़रमाते हैं:

’’ولا فرق في العمل بالحدیث في الأحکام أوفی الفضائل إذ الکل شرع‘‘

अहकाम हों या फ़ज़ाइल, ज़ईफ़ हदीस पर अमल करने में कोई फ़र्क़ नहीं है क्यूंकि यह सब (आमाल) शरीअत हैं। (तिबईनुल अजब बिमा वरद फ़ी फ़ज़ाइले रजब पेज नंबर 73)

आख़िर में अर्ज़ है कि पंद्रहवी शाबान को ख़ास क़िस्म की नमाज़ जैसे सौ (100) रकातें हज़ार (1000) मर्तबा सुरह इख़लास के साथ किसी ज़ईफ़ रिवायत में भी नहीं है। इस क़िस्म की तमाम रिवायतें मौज़ूअ और जाली हैं।

तंबीह: नुज़ूल बारी तआला हर रात को पिछले पहर होता है जैसा कि सहीहैन आदि की मुतावातिर हदीसों से साबित है। हम इस पर ईमान लाते हैं और इसकी कैफ़ियत को अल्लाह तआला के सुपुर्द करते हैं, वही बेहतर जानता है। वमा अलैना इल्लल बलाग़

……… संदर्भ ………

तहरीर: मुहद्दिसुल अस्र हाफ़िज़ ज़ुबैर अली ज़ई रहमतुल्लाह अलैह

तर्जुमा: मुहम्मद शिराज़ (कैफ़ी)

मूल लेख: تحقیقی و علمی مقالات (1/ 291) للشیخ زبیر علی زئی رحمہ اللہ

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